मुद्रास्फीति क्या है-मुद्रास्फीति कितने प्रकार की होती है?

मुद्रास्फीति → जब अर्थव्यवस्था में मुद्रा कि मात्रा में वृद्धि हो जाती है। तथा उसका फैलाव हो जाता है तो वस्तुओं की मांग में वृद्धि हो जाती है जिसके परिणाम स्वरूप वस्तुओं कि कीमतें बढ़ती है (मंहगाई बढ़ जाती है)। इस घटना को मुद्रास्फीति कहा जाता है।
मुद्रास्फीति-रेंगती मुद्रा
बाजार में मुद्रास्फीति दो प्रकार से उत्पन्न होती है-
1. लागत जन्य मुद्रास्फीति
2. मांग जन्य मुदास्फीति

मुद्रास्फीति के प्रकार

1. रेंगती मुद्रा (Creeping/ Moderate Inflation)→ जब स्फीति के वार्षिक दर एक अंक में हो तो इसे रेंगती मुद्रास्फीति कहते हैं। इस प्रकार की मुद्रा स्फीति का पूर्वाभास किया जा सकता है।
2. चलती हुई स्फीति (Walking Inflation)→ जब कीमतें साधारण रूप में बढ़ती हैं एवं वार्षिक स्फीति दर एक अंक की होती हैं। इस प्रकार की मुद्रा स्फीति को चलती हुई मुद्रास्फीति कहते हैं। (3 से 6 प्रतिशत)

3. दौड़ती हुई स्फीति (Running Inflation)→ जब कीमतें तीव्रता से 10 से 20 प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से बढ़ती हैं तो इसे दौड़ती हुई मुद्रा स्फीति कहते हैं। इसके नियंत्रण के लिये शक्तिशाली मौद्रिक नीतियों की आवश्यकता होती हैं।
4. कूदती हुई स्फीति (Galloping Inflation)→ यदि स्फीति की वार्षिक दर दो अंकीय या तीन अंकीय हो तो इसे कूदती हुई स्फीति कहाँ जाता हैं प्रथम विश्व युद्ध के बाद जर्मनी की स्फीति जो 140 से 4100 प्रतिशत वार्षिक थी। कूदती हुई स्फीति कहा जा सकता हैं।
5. अति स्फीति (Hyper Inflation)→ जब स्फीति की दर तीन अंकों से भी बहुत अधिक हो जाए तो उसे अति स्फीति कहा जाता है। विश्व आर्थिक इतिहास में नवम्बर 1923 अति स्फीति की दृष्टि से सबसे खराब अवधि थी। जबकि जनवरी 1922 से नवम्बर 1923 के बीच जर्मनी में स्फीति निर्देशांक 1 से बढ़कर 10000000000 हो गया था।

अन्य संबंधित अवधारणाएँ

• मुद्रा अवस्फीति/ मुद्रा संकुचन (Deflation)→ यह मुद्रा स्फीति की विपरीत दिशा है। मुद्रा अवस्फीति कीमत स्तर से गिरावट की वह अवस्था है, जो उस समय उत्पन्न होती है। जब वस्तुओं तथा सेवाओं का उत्पादन मौद्रिक आय की तुलना में तेजी से बढ़ता है।

• मुद्रा का अवमूल्यन (Devaluation of Money) – मुद्रा के अवमूल्यन से अभिप्राय मुद्रा के बाह्य मूल्य में कमी से होता है। जब सरकार मुद्रा बाहरी मूल्य कम कर देती है, तब देश की एक मुद्रा इकाई के बदले में कम विदेशी मुद्रा प्राप्त होने लगती है। मुद्रा के अवमूल्यन से मुद्रा के आन्तरिक मूल्य पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ता।
• मुद्रा प्रत्यवस्फीति (Reflation) – मुद्रा प्रत्यवस्फीति एक प्रकार से नियंत्रित मुद्रास्फीति होती है। जब कभी मुद्रा अवस्फीति की मात्रा इतनी अधिक हो जाती है कि वस्तुओं की कीमतें बहुत नीचे गिर जाती हैं, तो सरकार कीमतों को फिर से पटरी पर लाने के लिए मुद्रा का अधिक मात्रा में निर्गमन करने लगती है, जिसे मुद्रा प्रत्यवस्फीति की अवस्था कहते हैं।
• स्टैगफ्लेशन (Stagflation)→ स्टैगफ्लेशन शब्द का निर्माण स्टैगनेशन व इन्फ्लेशन दो शब्दों को मिलाकर हुआ है। स्टैगफ्लेशन उस स्थिति को इंगित करता है। जब मुद्रास्फीति की दर व बेरोजगारी दोनों ही उच्च अवस्था में पहुँच जाती है। ऐसी स्थिति में मुद्रास्फीति के साथ आर्थिक अस्थिरता की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।

मुद्रास्फीति

लॉरेंज वक्र

1905 में अमेरिकी अर्थशास्त्री मैक्स लॉरेंज द्वारा विकसित धन वितरण की एक चित्रमय प्रतिनिधित्व एक सीधे विकर्ण
लाइन धन वितरण की सही समानता का प्रतिनिधित्व करता है। लॉरेंज वक्र धन वितरण की वास्तविकता दिखाता है।
सीधी रेखा और घुमावदार रेखा के बीच के अंतर को धन वितरण, गिनी गुणांक द्वारा प्रदर्शित किया जाता है।

यह वक्र प्रदर्शित करता है कि देश के धन का कितना प्रतिशत एक राष्ट्र के निवासियों का प्रतिशत दिखाने के लिए
इस्तेमाल किया जा सकता है।

गिनी गुणांक का मान जितना अधिक होगा, समाज में विषमता उतनी अधिक होगी।

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