Hindi Bhasha Ka Vikas

भारत में भाषा का विकास आर्यों के आगमन से माना जाता है। आर्यों के साथ जिस भाषा का विकास हुआ उसे संस्कृत कहते हैं। आर्य भारत में मध्य एशिया से सिन्धु द्वार के द्वारा भारत के पंजाब प्रान्त में बसे । संस्कृत से जो भी भाषा का विकास हुआ उन्हें भारतीय आर्य भाषा कहते हैं। भारतीय आर्य भाषा को तीन भागों में बांटकर पढ़ सकते हैं।

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1.प्राचीन आर्य भाषा

(1500 ई.पू. से 500ई.पू.)-  मुख्यतः संस्कृत जो भारत में प्रचलित हुई उसी संस्कृत को प्राचीन आर्य भाषा कहा गया इसको भी दो भागों में बाँटा जा सकता है।

(a) वैदिक संस्कृत⇒ (1500 ई.पू.-1000 ई.पू.)-  मूल संस्कृत को वैदिक संस्कृत कहा गया तथा वैदिक संस्कृत में ही वेद पुराण वेदांग, उपनिषद् (वेदांत) की रचना की गई।

(b) लौकिक संस्कृत :- वैदिक संस्कृत का सरलतम रूप (1000 ( ई.पू. – 500 ई.पू.) लौकिक संस्कृत कहलाया तथा लौकिक संस्कृत में ही ग्रंथ की रचना की गई।

2. मध्यकालीन आर्यभाषा

(500ई.पू.-1000ई.पू.)- मध्यकालीन आर्यभाषा को 3 भागों में बाँटा जा सकता है।

(a) पाली (500 ई.पू. से 1ली ई.वी.)- लौकिक संस्कृत का अपभ्रंश पाली भाषा को कहा गया तथा इसके जनक गौतम बुद्ध को माना जाता है। गौतम बुद्ध के उपदेश वाली भाषा में ही दिए गए है तथा इसे ठथम देश भाषा भी कहा जाता है।

(b) प्राकृत (पहली ईसवी-500ईसवी) पाली को कहा जाता है। अत्यधिक सरल होने के कारण इसे गांव की भाषा वा आमजन की भाषा भी कहा जाता है तथा इसके जनक महावीर जैन को माना जाता है।

(c) अपभ्रंश (500ईवी.-1000ई.वी.) :- प्राकृत भाषा के अपभ्रंश को अपभ्रंश कहा गया । कुछ आचार्यों ने अपभ्रंश को अलग-अलग नामों से संबोधित किया है जो निम्नलिखित है।

  • आचार्य दण्डी ने अपभ्रंश को आभीर भाषा कहा है।
  • अपभ्रश को उकार बहुला कहा जाता है।
  • स्वयंभू ने अपभ्रंश को देसी भाषा कहा है।
  • किशोरीदास वाजपेयी ने अपभ्रंश को ण–ण भाषा कहा है।
  • भरतमुनि ने अपभ्रंश भाषा को अशुद्ध भाषा कहा है।
  • अपभ्रंश शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग पतंजलि ने अपने ग्रंथ महाभाष्य में किया था।
  • अपभ्रंश और अवहट्ट के बीच के काल को संक्रमित काल कहा जाता है।
  • चन्द्रधर शर्मा गुलेरी ने अपभ्रंश को पुरानी हिन्दी कहा है।
  • आचार्य राम चन्द्र शुक्ल ने अपभ्रंश को साहित्यिक पुरानी हिन्दी कहा है।
  • अपभ्रंश की रचना ‘परम-चरऊ है। जिसे स्वयं भू ने लिखा था इसी कारण इन्हें हिन्दी का आदि-कवि भी कहा जाता है।
  • अपभ्रंश के प्रथम महाकवि स्वयंभू को कहा जाता है।
  • स्वयंभू को हिन्दी का वाल्मीकि कहा जाता है।
  • अवहट्ट को संक्रमण भाषा कहा जाता है।
  • अवहट्ट की पहली रचना कीर्तीलता है, जिसकी रचना विद्यापती ने की थी।

3. आधुनिक आर्य भाषा

(1000-आज तक)- आधुनिक आर्य भाषा को पुनः तीन भागों में बाँटा गया है।

(a) प्राचीन हिन्दी (1000ई वी.-1350ई.वी.)
(b) माध्यकालीन हिन्दी (1350ई.वी.-1850ई.वी.)
(c) आधुनिक हिन्दी (1850ई.वी.- आज तक)

प्राचीन हिन्दी

(1000ई.वी.-1350 ई.वी.)- अपभ्रंश तथा प्राकृतनिष्ठ हिन्दी को प्राचीन हिन्दी कहा गया तथा प्राचीन हिन्दी का प्रयोग साहित्य में 1000ई.वी. से प्रारम्भ हो गया। जो निम्नलिखित है:-

  • हिन्दी का पहला महाकाव्य ‘पृथ्वीराज रासो‘ है, जिसे चन्दरवरदाई ने लिखा था। आपको हिन्दी का पहला कवि कहा जाता है।
  • डॉ. गणपति चन्द्र के अनुसार हिन्दी के पहले कवि शालीभ्रद सूरी थे तथा इनकी पहली रचना भरतेश्वर बाहुबली है। यह जैन साहित्य से सम्बंधित है।

मध्यकालीन हिन्दी

(1350ई.वी.-1850ई.वी.)- उर्दूनिष्ठ हिन्दी तथा अरबी, फारसी शब्दों से युक्त हिन्दी को मध्यकालीन हिन्दी कहा गया, जिसका प्रयोग भक्तिकाल में सर्वाधिक हुआ।

आधुनिक हिन्दी

(1850 ई.वी.- आज तक)- आधुनिक हिन्दी के रूप में संस्कृतनिष्ठ तथा उर्दूनिष्ठ दोनों प्रकार की हिन्दी का प्रचलन था, लेकिन उर्दूनिष्ठ हिन्दी के मानक रूप को प्रचलन में लाया गया इसे ही आधुनिक हिन्दी कहा गया।

हिन्दी भाषा बनने का सफर

संस्कृत-पाली-प्राकृत-अपभ्रंश-अवहट्ट-हिन्दी

खड़ी बोली-

खड़ी = हिन्दी+उर्दू+फारसी+अरबी मिश्रितभाषा

  • खड़ी बोली के जनक अमीर खुसरों को माना जाता है। अमीर खुसरों ने खड़ी बोली का सर्वप्रथम प्रयोग अपने पहेलियों में किया था।
  • खड़ी बोली में ही अमीर खुसरों ने ‘खालिकवारी‘ की पद्य शैली में रचना की। जिसमें भाषा के लिए पांच बार हिन्दी तथा तीस बार हिन्दबी का प्रयोग किया।
  • खड़ी बोली का गद्य रूप में प्रयोग लल्लू लाल ने अपनी कृति प्रेमसागर में किया।
  • खड़ी बोली में प्रथम मकाकाव्य ‘प्रिय – प्रवास‘ जिसे अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध ने लिखा।
  • मैथलीशरण गुप्त को आधुनिक युग का तुलसीदास कहा गया है।
  • राजभाषा :- राजभाषा का अर्थ होता है सरकारी काम-काज की भाषा भारतीय संविधान के भाग-17 के अनुच्छेद 343-351 तक राजभाषा संम्बंधी प्रावधान है।
  • 14 सितम्बर 1949 को गोपाल स्वामी आयंगर ने हिन्दी को राज्यभाषा के रूप में प्रस्तुत किया तथा इसी दिन हिन्दी को भारत की राजभाषा घोषित कर दिया गया।
  • अनुच्छेद-343 इसमें कहा गया है कि भारत संघ की राजभाषा हिन्दी तथा राष्ट्रीय लिपि देवनागरी है।
  • अनुच्छेद-344 इसमें कहा गया है कि राष्ट्रपति को राजभाषा सम्बंधी सलाह देने के लिए एक राजभाषा आयोग का गठन किया जायेगा। जिसके अध्यक्ष की नियुक्ति राष्ट्रपति करेगा।
  • 7 जून 1955 को प्रथम राजभाषा आयोग का गठन किया गया। जिसके प्रथम अध्यक्ष बाल गंगाधर खेर (बी.जी.खेर) थे।
  • 16 नवम्बर 1957 को संसदीय राजभाषा आयोग का गठन किया गया जिसके अध्यक्ष गोविन्द वल्लभ भाई पंत (जी.बी. पन्त) थे।

अनुच्छेद-345 इसमें कहा गया है कि प्रत्येक राज्य अनुसूची-8 में वर्णित 22 प्रादेशिक भाषाओं में से किसी एक को अपने राज्य की राजभाषा बना सकता है।

भारत के 9 राज्य (मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़ राजस्थान, झारखण्ड, बिहार, उत्तराखण्ड, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा) की राजभाषा हिन्दी है। इनको हिन्द प्रदेश भी कहा जाता है।

दिल्ली एक ऐसा केन्द्र शासित प्रदेश है जिसकी राजभाषा हिन्दी है। महाराष्ट्र, गुजरात, पंजाब तथा अंडमान निकोबार द्वीपसमूह में हिन्दी को द्वितीय भाषा का दर्जा प्राप्त है।

 

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अनुच्छेद-346 राज्य तथा संघ के मध्य तथा राज्य एवं राज्य के मध्य संचार की भाषा वही होगी जो केन्द्र की राजभाषा होगी लेकिन विशेष परिस्थितियों में अंग्रेजी का प्रयोग किया जायेगा।

अनुच्छेद-347 किसी क्षेत्र के द्वारा बोली जाने वाली भाषा को राष्ट्रपति अनुसूची 8 में स्थान दे सकता है।

अनुच्छेद-348 उच्च न्यायालय, उच्चतम न्यायालय, सासंद तथा विधेयक के प्रयोग में अंग्रेजी लाई जाती है।

अनुच्छेद-349 भाषा के लिए विशेष अधिनियम ।

अनुच्छेद- -350 अभ्यावेदन की भाषा हिन्दी होगी लेकिन विशेष परिस्थितियों में अंग्रेजी का प्रयोग किया जायेगा।

अनुच्छेद-350 (क) प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा की शिक्षा को अनिवार्य करना।
अनुच्छेद-350 (ख) किसी अल्पभाषी के लिए राष्ट्रपति कुछ अधि कार या उनके लिए लिए विशेष अधिकारी की नियुक्ति कर सकता है।

अनुच्छेद 351 केन्द्र सरकार तथा राज्य सरकार का यह दायित्व होगा कि हिन्दी के प्रचार एवं प्रसार के लिए आवश्यक कदम उठाए।

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पहला हिंदी विश्व सम्मेलन 10-14 जनवरी 1975 को नागपुर में किया गया, जिसकी अध्यक्षता मॉरीशस के राष्ट्रपति शिवसागर रामगुलाम ने की। दसवां हिन्दी विश्व सम्मेलन 10-12 सितम्बर 2015 को भोपाल में किया गया, जिसकी अध्यक्षता सुषमा स्वराज ने की। ग्यारहवाँ हिन्दी विश्व सम्मेलन 2018 में मॉरीशस में किया गया। 10 जनवरी को विश्व हिन्दी दिवस मनाया जाता है।

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हिन्दी की 5 उपभाषाएं तथा 18 बोलियां हैं-

  1. बोली– एक छोटे से क्षेत्र में बोली जाने वाली भाषा, बोली कहलाती है। इसमें साहित्य की रचना नहीं होती है।
  2. विभाषा- जब बोली का क्षेत्र बड़ जाए अर्थात् यह एक प्रान्त या उपप्रान्त में बोली जाने लगे तो वह विभाषा कहलाने लगती है। इसमें साहित्य की रचना की जाती है।
  3. मातृभाषा– अपने परिवार तथा समाज के बीच में रहकर जो भाषा सीखते हैं उसे मातृभाषा कहते हैं। 21 फरवरी को प्रत्येक वर्ष मातृभाषा दिवस मनाया जाता है
  4. परिनिष्ठ भाषा- व्याकरण सम्बंधित भाषा को ही परिनिष्ठ भाषा कहते हैं। इसे प्राजल भाषा की कहते है।
  5. संपर्क भाषा– दो विभिन्न मातृभाषियों के मध्य विचारों के आदान-प्रदान करने के लिए जिस उभयनिष्ट भाषा को अपनाया जाता हैं। उसे संपर्क भाषा कहते हैं। इसे वाहन भाषा, व्यवसायिक भाषा उभय भाषा भी कहा जाता हैं। विश्व की सबसे बड़ी संपर्क भाषा अंग्रेजी हैं। तथा भारत की सबसे बड़ी संपर्क भाष हिन्दी हैं।

संचार भाषा- पत्राचार के माध्यम से अपने विचारों को व्यक्त करते के लिए जिस प्रकार की भाषा का प्रयोग किया जाता हैं उसे संचार भाषा कहते हैं।

  1. कौरवी (खड़ी बोली) : खड़ी बोली का तात्पर्य है ‘स्टैंडर्ड भाषा। इस अर्थ में सभी भाषाओं की अपनी खड़ी बोली हो सकती है। किन्तु हिन्दी में खड़ी बोली मेरठ, सहारनपुर, देहरादून, रामपुर, मुजफ्फर नगरख् बुलंदशहर आदि प्रदेशों में बोली जाने वाली भाषा को कहा जाता है। इसे कौरवी, नागरी आदि नामों से भी सम्बोधित किया जाता है। ग्रियर्सन ने इसे देशी हिन्दुस्तानी कहा है। खड़ी बोली की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित है।
  2. हरियाणी : यह दिल्ली, करनाल, रोहतक, हिसार, पटियाला, नामा, जींद, पूर्वी हिसार आदि प्रदेशों में बोली जाती है। इस पर पंजाबी और राजस्थानी का पर्याप्त प्रभाव है। ग्रियर्सन ने इसे बाँगरू कहा है। इस प्रदेश में अहीरों अथवा जाटों की प्रधानता है, अतः इसे ‘जाटू’ भाषा भी कहा जाता है। हरियाणी में परिनिश्चित साहित्य का अभाव है। हरियाणी की प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार है –
  3. ब्रजभाषा ब्रजभाषा का विकास शौरसेनी से हुआ है। ब्रजभाषा पश्चिमी हिन्दी की अत्यन्त समृद्ध एवं सरस भाषा है। साहित्य-जगत् में आधुनिक काल से पूर्व ब्रजभाषा का ही बोलबाला था। यह मथुरा, वृन्दावन, आगरा, भरतपुर, धौलपुर, करौली, पश्चिमी ग्वालियर, , अलीगढ़ मैनपुरी, बदायूँ बरेली आदि प्रदेशों में बोली जाने वाली भाषा है। पश्चिमी हिन्दी का वास्तविक प्रतिनिधित्व ब्रजभाषा ही करती है। ब्रजभाषा की लम्बी साहित्य परम्परा रही है। सूर, नन्ददास, बिहारी,धनानन्द, सेनापति, देव, भारतेन्दु, रत्नाकर आदि ब्रजभाषा के प्रसिद्ध कवि है। ब्रजभाषा की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं।
  4. बुंदेली– बुंदेलखण्ड की भाषा को बुंदेली अथवा बुंदेलखण्डी कहा जाता है। चम्बल और यमुना नदियों तथा जबलपुर, रीवां और विन्ट य पर्वत के बीच के प्रदेश को बुंदेलखण्ड कहा जाता है। इसमें मध् यप्रदेश और उत्तरप्रदेश, दोनों राज्यों के प्रदेश सम्मिलित हैं। बांदा, झाँसी, हमीरपुर, ग्वालियर, बालाघाट, ओरछा, दतिया, सागर, होशंगाबाद, आदि जिले इस क्षेत्र के अन्तर्गत आते हैं। बुन्देली के चारों ओर ब्रज, कन्नौजी, मालवी, मराठी और बघेली का प्रसार है। बुन्देली पर ब्रज एवं अवधी का प्रभाव है। क्रिया रूपों की दृष्टि से बुंदेली में सहायक क्रिया ‘ह’ का विलोपन हो जाता है, अतः ‘हूँ’ के स्थान पर आँय, हाँय, ‘हैं’ के स्थान पर औ, आव तथा ‘हो’ के स्थान पर ते, ती आदि रूप पाये जाते हैं।
  5. कन्नौजी– यह कन्नौज प्रदेश की भाषा है। इसका क्षेत्र अत्यन्त सीमित है। यह कानपुर, पीलीभीत, शाहजहाँपुर, हरदोई आदि प्रदेशों में भेद करना कठिन हो जाता है। तथापि ब्रज और कन्नौजी में कतिपय संरचनागत भेद पाये जाते हैं, जैसे ब्रज की ऐ तथा औ६ वनियों को कन्नौजी में संयुक्त स्वर अइ तथा अउ रूप में बोला जाता है, जैसे कौन > कउन।

पहाड़ी हिन्दी की प्रमुख बोलियाँ-

  1. कुमाउनी – यह कुमाऊं प्रदेश की बोली है, जिसे प्राचीन काल में कुर्माचल प्रदेश कहा जाता था। कुमाउनी को दरद, राजस्थानी, खड़ी बोली, किरात, भोट आदि बालियों से प्रभावित माना जाता है। इसकी 12 उपबोलियाँ मानी जाती हैं, जिसमें से ‘खस’ प्रमुख उपबोली है।
  2. गढ़वाली गढ़वाल प्रदेश की बोली को गढ़वाली कहा जाता है, इस क्षेत्र में गढ़वाली में लोकगीत-साहित्य का प्राचुर्य है। गढ़वाली पर ब्रज और राजस्थानी का प्रभाव भी माना जाता है।

पूर्वी हिन्दी

पूर्वी हिन्दी का विकास अर्धमागधी प्राकृत से हुआ है। पश्चिमी हिन्दी और भोजपुरी के बीच के क्षेत्र को पूर्वी हिन्दी का क्षेत्र माना जाता है। पूर्वी हिन्दी के चारों ओर नेपाली, कन्नौजी, बुन्देली, भोजपुरी और मराठी बोली जाती है।

  1. अवधी– पूर्वी हिन्दी की बोलियों में अवधी का महत्वपूर्ण स्थान है। साहित्य की दृष्टि से ब्रज के पश्चात् अवधी ही समृद्ध रही है। अवध पी को पूर्वी अथवा कौसली भी कहा जाता है। यह लखनऊ, इलाहाबाद, उन्नाव, सीतापुर, बहराइच, फैजाबाद, फतेहपुर, जौनपुर, बाराबाँकी आदि प्रदेशों में बोली जाती है। अवधी में पर्याप्त मात्रा में साहित्य सृजन हुआ है। तुलसी, जायसी, मंझन, उसमान आदि इसके प्रतिनिधि कवि हैं। अवधी की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-
  2. बधेली-बधेल खण्ड की बोली को बधेली कहा जाता है। बधेल खण्ड का केन्द्र रीवाँ (मध्य प्रदेश) है। बधेली मुख्यतः जबलपुर, मांडला, हमीरपुर, मिर्जापुर , बांदा, दमोह आदि क्षेत्रों में बोली जाती है। कतिपय विद्वान इसे स्वतंत्र बोली न मानकर इसे केवल अवधी की दक्षिणी शाखा मानने के पक्ष में है। बधेली की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-
    1.   अवधी का ‘व’ बधेली में ब हो जाता है, जैसे- आवा > आबा।
    विशेषणों में ‘हा’ प्रत्यय का प्रयोग अधिक होता है, जैसे- अधिकहा। बधेली में अधिकांशतः आदिवासियों की शब्दावली प्रयुक्त होती है।
  3. छत्तीसगढ़ी : मध्य प्रदेश के रायपुर, बिलासपुर, सारंगगढ़, खैरागढ़, बालाघाट, नंदगाँव आदि क्षेत्रों की बोली को छत्तीसगढ़ी कहा जाता है। इस बोली में साहित्य का अभाव है। इस बोली की प्रमुख विशेषता यह है कि इसमें ध्वनियों के महाप्राणीकरण की प्रवृत्ति पाई जाती है,
    जैसे
    जन > इन, दौड़ > धौड़ आदि।

बिहारी की प्रमुख बोलियाँ-

  1. भोजपुरी  ⇒यह उत्तर प्रदेश के बनारस, गाजीपुर, गोरखपुर, देवरिया, आजमगढ़ आदि तथा बिहार के चम्पारन, राँची आदि प्रदेशों में बोली जाती है। कबीर, धरणीदास, धरमदास आदि भोजपुरी के प्रमुख कवि हैं। इसकी प्रमुख विशेषताए: निम्नलिखित हैं-
  2. मगही– मगध प्रदेश की बोली को मगही कहाँ जाता है। पटना,गया, भागलपुर, हजारीबाग आदि इस बोली के प्रमुख क्षेत्र हैं। मगही और भोजपुरी बोली में बहुत अधिक साम्य है। मैथिली- मगध के ऊपरी भाग की बोली को मैथिली कहा जाता है। मुजफरपुर, दरभंगा, पूर्णिया, मुंगेर आदि मैथिली बोली के क्षेत्र है। मैथिली के प्राचीन कवियों में विद्यापति, गोविन्ददास आदि प्रमुख हैं। हरिमोहन झा, चंदा झा आदि मैथिली के आधुनिक प्रमुख साहित्यकार हैं। मैथिली की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित है।

1. यह अवधी और भोजपुरी के अधिक समीप की भाषा है।
2. मैथिली में श, ष, स के स्थान पर ‘ह’ हो जाता है,
जैसे पुष्प > पुहुप।
वर्ग (क) इसके अंतर्गत हिन्दी प्रदेशों को रखा गया है।
वर्ग (ख) इसमें ऐसे प्रदेश शामिल किए गए है जहाँ हिन्दी को बोला व समझा जाता है।
जैसे- महाराष्ट्र, पंजाब, गुजरात, अण्डमान निकोबार द्वीपसमूह
वर्ग (ग) ऐसें राज्य जहाँ हिन्दी को न तो बोला जाता है और न ही समझा जाता है।
जैसे- दक्षिण भारत के समस्त राज्य

3. आग्नेय या ऑस्ट्रिक भाषा परिवार- बोलने वालों के आधार पर (1.3%) इसका तीसरा स्थान आता है। इस भाषा परिवार की प्रमुख भाषाओं में मुण्डा हो, संथाली प्रमुख है। इसको म.प्र. छ.ग. तथा झारखण्ड में अनुसूचित जनजातियों द्वारा बोला जाता है। इसलिए इन्हें किरात कहा जाता है।

4. चीनी-तिब्बती भाषा परिवार- बोलने वालों के आधार पर (0.7%) चौथा स्थान है इसे उत्तर-पूर्वी राज्यों में तिब्बत से सटे हुए क्षेत्रों में बोला जाता है तथा इसे बोलने वालों को निषाद कहा जाता है।

लिपि

लिपि की परिभाषा-

  • पाणिनि की अष्टाध्यायी में लिपि, लिपिकर, आदि शब्द का उल्लेख मिलता है।
  • किसी भाषा की ध्वनियों को व्यक्त करने के लिए जो चिह्न संकेत जिस रूप में प्रयुक्त होते है उसे लिपि कहते हैं।
    चितले के अनुसार – “ध्वनि और वर्ण चिह्न के सम्बन्धों का नाम ही लिपि है। एक ही चिह्न से यदि एक ध्वनि ज्ञात हो जाये तो लिपि का उद्देश्य सफल माना जा सकता है।”

भारत की प्राचीन लिपियाँ-

  • जैन साहित्य के ‘पन्नवणासूत्र’ में 18 लिपियों के नाम दिए गए है।
  • बौद्ध साहित्य की संस्कृत पुस्तक ‘ललितविस्तार में 64 लिपियों के नाम है।
  • हमारे देश के पुराने शिलालेखों और सिक्कों पर दो प्राचीन लिपियाँ मिलती हैं-
    (1) ब्राम्ही, और (2) खरोष्ठी।
  • ब्राम्ही लिपि के सर्वप्रथम साक्ष्य उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के पिपरावा के स्तूपों से प्राप्त होता है, तथा राजस्थान के अजमेर जिले के बडली गाँव के शिलालेखों से प्राप्त होता है।

ब्राम्ही लिपि का विकास-

  • ब्राम्ही लिपि का प्रयोग भारत में 5वीं सदी ई.पू. से लेकर 350 ई. तक हुआ।
  • 350 ई. के बाद यह दो शैलियों में बँट गया
    1. उत्तरी शैली 2. दक्षिणी शैली।
  • जिस शैली का प्रचार उत्तर भारत में हुआ वह उत्तरी शैली कहलायी तथा जिसका प्रचार दक्षिण भारत में हुआ वह दक्षिणी शैली कहलायी।
  • इन्हीं दोनों शैलियों से भारत की अन्य लिपियों का विकास हुआ है।

देव नागरी लिपि का नामकरण-

  • देवनागरी लिपि का विकास ब्राम्ही लिपि से हुआ है।
  1. कुछ विद्वानों के अनुसार ‘ललित विस्तार में वर्णित ‘नाग लिपि’ के आधार पर इसका नाम ‘नागरी पड़ा।
  2. कुछ विद्वानों के अनुसार गुजरात में नागर ब्राह्माणों द्वारा प्रयोग किए जाने के कारण इसका नाम ‘नागरी’ पड़ा।
  3. कुछ विद्वानों का मानना है कि इसका प्रयोग नगरों में होता था, अतः इसका नाम नागरी पड़ा।
  4. काशी को देवनगर कहा जाता है, वहाँ प्रचलित होने के कारण देवनागरी कहलायी।
  5. पं. किशोरी दास वाजपेयी के अनुसार देश की राष्ट्रभाषा किसी समय जो प्राकृत थी, उसका नाम ‘नागर’ था। वह नागर भाषा या नागरी भाषा जिस लिपि में लिखी जाती थी, उसे भी लोग नागरी कहने लगे।

देवनागरी लिपि के भेद-

  • नागरी के चार भेद माने गए है –
    (1) अर्द्धनागरी      (2) पूर्वी नागरी
    (3) नन्दि नागरी    (द) नागरी।

देवनागरी लिपि की वैज्ञानिकता-

देव नागरी लिपि में जहाँ वैज्ञानिक दृष्टि से अनेक त्रुटियाँ हैं, वहीं उसमें वैज्ञानिकता भी है। उपर्युक्त वैज्ञानिक त्रुटियों की ओर देखें तो उनमें एक त्रुटि ऐसी जो देवनागरी से अनिवार्य रूप से जुड़ी है। वह है, इसकी आक्षरिकता। पर यही आक्षरिकता देवनागरी लिपि का विशेष गुण है। क्योंकि इससे शब्दोच्चारण व लेखन में समानता बनी रहती है।

  1. आक्षरिकता– वैज्ञानिक दृष्टि से आक्षरिकता उच्चारण व लेखन में एकता स्थापित करती है। अतः यह दुर्गण न होकर गुण है। उच्चारण में हम सामाजिक वर्ण का उच्चारण करते हैं, न कि स्वर आधेर व्यंजन का अलग-अलग उच्चारण। यथा “रा’ को हम ‘रा’ ही बोलते हैं, न कि र् + अ ।
  2. पूर्ण ध्वनित्व– देवनागरी में 4 – 5 ही ध्वनियों के लिपि चिन्ह नहीं हैं। इसका कारण यह है कि इन ध्वनियों का उच्चारण ही संयुक्त ध्वनियों की तरह हैं। यथा न्ह, ल्ह, म्ह आदि। अतः ध्वनियों की संख्या बढ़ाने की अपेक्षा उन्हें संयुक्त रूप से लिखना ही उचित समझाा गया। कहा जा सकता है कि देव नागरी में सभी ध्वनियों के लिये चिन्ह हैं।
  3. एक चिह्ता – देव नागरी में 3-4 लिपि चिन्हों को छोड़कर प्रायः सबसे लिये एक ही चिन्ह है। जहाँ दो लिपि चिन्ह हैं, वह अन्य लिपियों का प्रभाव है।
  4. मात्रा प्रयोग– देव नागरी लिपि पर सबसे बड़ा आरोप मात्राओं का है। इसमें मात्राएँ वर्ण के चारों ओर लिखी जाती हैं। वस्तुतः छोटी ‘ई’ की मात्रा को छोड़कर अन्य सभी मात्राएँ जिन्हा की स्थिति के अनुरूप, ऊपर-नीचे तथा सामने या आगे हैं। अतः ये भी वैज्ञानिक हैं।
  5. भ्रामक चिन्ह– नागरी के तीन-चार लिपि चिन्ह स्वल्प-सा भ्रम पैदा करते हैं। वस्तुतः लिपि सीखने की वस्तु हैं। सीखने से उसमें कोई भ्रम नहीं रहता। कोई भी व्यक्ति ‘भ्रम को ‘भम्र नही पढ़ लेता। ‘ख’ तथा आधा ण् अवश्य भ्रामक हैं। अब ‘ख’ का समाधान नीचे के हिस्सों को मिलाकर तथा ‘ण के स्थान र ‘ण’ का प्रयोग अपनाकर कर दिया गया है।
  6. देवनागरी वर्गीकृत लिपि– देवनागरी लिपि होने से संसार में सर्वाधिक वैज्ञानिक लिपि है। इसमें पहले समस्त स्वर फिर समस्त व्यंजन है। इसमें भी उच्चारण व प्रयत्न के आधार पर वर्गीकरण पूर्ण वैज्ञानिक है।
  7. ध्वनि और उच्चारण– देव नागरी लिपि के चिन्हों के नाम ध्वनि एवं उसके उच्चारण के अनुरूप होने से पूर्ण वैज्ञानिक हैं। फारसी में अलिफ से ‘अ’, बे से ‘ब’, पे से ‘प’ तथा अंग्रेजी में बी से ‘ब’, डब्ल्यू से ‘व’ आदि बनते हैं, पर देव नागरी में ‘अ’ से अ, ‘ब’ से ‘ब’ आदि ही लिखा व समझा जाता है।
  8. एक चिन्ह-एक-ध्वनि– देवनागरी में एक लिपि चिन्ह से एक ही ध्वनि बनती है, जो पूर्णतः वैज्ञानिक हैं। रोमन लिपि में आधे से अधिक ध्वनियाँ दो-दो या अधिक ध्वनियों से बनती है। BH से भ, CHH से छ आदि ऐसे ही उदाहरण है।
  9. देवनागरी ही ऐसी लिपि है, जिसमें हस्व तथा दीर्घ स्वरों के लिए अलग-अलग लिपि चिन्ह है।
  10. जैसा लिखा जाता है वैसा पढ़ा जाता है- देव नागरी लिपि में जिस स्वर को या मात्रा को जैसा लिखा जायेगा, वैसा ही सर्वदा बोला जायेगा, पर रोमन के PUT को पुट और नहीं है कि मात्राओं को क्या पढ़ा जाय । कोई ‘बुलन्द‘ पढ़ता है तो कोई ‘बलन्द‘ । अतः सु–पाठ्यता देवनागरी का सबसे बड़ा वैज्ञानिक गुण है। इसमें जो लिखा जाता है, वही पढ़ा जाता है। इस प्रकार देव नागरी लिपि एक वैज्ञानिक लिपि है।

देवनागरी लिपि का प्रयोग-

  • देवनागरी का सबसे पहले प्रयोग (7वीं, 8वीं) शताब्दी गुजरात के राजा जयभट्ट के एक शिलालेख में हुआ है।
  • आठवीं शताब्दी में राष्ट्रकूट राजाओं द्वारा इसका प्रयोग किया गया।
  • नवीं शताब्दी में इसका प्रयोग बड़ौदा के ध्रुवराज द्वारा किया गया।
  • उत्तर भारत में सातवीं शताब्दी में हर्षवर्द्धन के शासन काल में इसका प्रयोग हुआ।
  • उत्तर एवं दक्षिण भारत में सातवीं शताब्दी में इसका प्रयोग एक साथ हुआ।
  • दसवीं शताब्दी में देवनागरी का प्रयोग पंजाब, बंगाल, नेपाल, केरल तथा श्रीलंका में हुआ।
  • अंग्रेजों के समय मदन मोहन मालवीय के प्रयत्न से उत्तर – प्रदेश की कचहरियों में देवनागरी का प्रयोग हुआ तो बिहार में अयोध्या प्रसाद खत्री के प्रयत्न से।
  • कोलकता हाईकोर्ट के जस्टिस श्री शरद चरण मित्र ने सर्वप्रथम देवनागरी लिपि को राष्ट्रलिपि के रूप में अपनाने को कहा था।

देवनागरी लिपि का विकास-

देवनागरी लिपि का विकास इस क्रम में हुआ है

ब्राम्ही लिपि खरोष्ठीलिपि- गुप्तलिपि कुटिल लिपि – प्राचीन नागरी देवनागरी।

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नागरी लिपि का प्रयोग काल 8वीं-9वीं सदी ई. से आरम्भ हुआ। 10वीं से 12वीं सदी के बीच इसी प्राचीन नागरी से उत्तरी भारत की अधिकांश आधुनिक लिपियों का विकास हुआ। इसकी दो शाखाएं मिलती हैं पश्चिमी व पूर्वी । पश्चिमी शाखा की सर्वप्रमुख/ प्रतिनिधि लिपि देवनागरी लिपि है ।

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भारत की लिपियाँ-

भारत में कुल 22 लिपियों का प्रचलन है। जो इस प्रकार हैं- 1. ब्राम्ही 2. खरोष्ठी 3. गुप्त 4. कुटिल 5. देवनागरी 6. शारदा 7. बंगला 8. तेलुगू 9. कन्नड़ 10. ग्रन्थ 11. कलिंग 12. तमिल 13. बट्टेलुतु 14. मलयालम 15. गुरूमुखी 16. गुजराती 17. मैथिली 18. मोडी 19. कैथी 20. महाजनी 21. उर्दू 22. रोमन

 

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अपभ्रंश

पंडित भोलाराम तिवारी के अनुसार :- इनके अनुसार अपभ्रंश को 7 वर्गों में बाँटा गया है जिनसे भारत की भाषाओं का जन्म हुआ है ।

इसके कुल 27 रूप माने गए।

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भाषा

भाषा का अर्थ एवं स्वरूप

  • ‘भाषा’ शब्द संस्कृत के ‘भाष्’ धातु से बना है, जिसका अर्थ होता है बोलना, बताना या व्यक्त वाणी।
  • विश्व में लगभग तीन हजार भाषाएँ बोली जाती है।
  • भाषा को सबसे प्राचीन रूप ‘ऋग्वेद’ संहिता में प्राप्त होता है।
  • भारत की प्रथम ‘देशभाषा पाली है। जिसे पुरानी प्राकृत भी कहा जाता है।
  • सबसे पहले भारत की भाषाओं का सर्वेक्षण जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन ने सन् 1894 ई. में किया था।
  • जार्ज ग्रियर्सन की पुस्तक का नाम है ‘ए लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया।
  • जार्ज ग्रियर्सन के अनुसार भारत में 179 भाषाएँ तथा 544 बोलियाँ है।
  • भाषा की प्रथम एवं छोटी इकाई ‘ध्वनि है, द्वितीय ‘शब्द’ एवं तृतीय तथा सबसे बड़ी इकाई ‘वाक्य’ है।
  • मनुष्य की भाषा की उत्पत्ति ‘मौखिक रूप से हुई है।
  • भाषा परिवर्तनशील होती है। भाषा में नये शब्दों, वाक्यों का आगमन होता रहता है और पुराने टूटते मिटते रहते है।

भाषा की परिभाषा-

  • भाषा को परिभाषित करना कठिन है। फिर भी, अनेक विद्वानों ने इसकी परिभाषाएँ अपने-अपने ढंग से दी है।
  • आचार्य देवेन्द्रनाथ के अनुसार- “उच्चरित ध्वनि संकेतों की सहायता से भाव या विचार की पूर्ण अथवा जिसकी सहायता से मनुष्य परस्पर विचार-विनिमय या सहयोग करते हैं, उस यादृच्छिक , रूढ़ ध्वनि- संकेत की प्रणाली को भाषा कहते हैं।
  • डॉ. श्याम सुन्दर दास के अनुसार– “मनुष्य और मनुष्य के बीच वस्तुओं के विषय में अपनी इच्छा और मति का आदान-प्रदान करने के लिए व्यक्त ध्वनि संकेतों का जो व्यवहार होता है, उसे भाषा कहते है।
  • डॉ. बाबूराम सक्सेना के अनुसार– “जिन ध्वनि-चिह्नों द्वारा मनुष्य परस्पर विचार विनिमय करता है, उसको समष्टि रूप से भाषा कहते है।
  • डॉ. भोलानाथ तिवारी के अनुसार- ”भाषा, उच्चारण-अवयवों से उच्चरित (मूलतः) प्रायः यादृच्छिक ध्वनि प्रतीकों की वह व्यवस्था है, जिसके द्वारा किसी भाषा समाज के लोग आपस में विचारों का आदान प्रदान करते है।
  • सुमित्रानन्दन पन्त के अनुसार- “भाषा संसार का नादमय चित्र है, ध्वनिमय स्वरूप है, यह विश्व की हृदय तन्त्री की झंकार है, जिसके स्वर में अभिव्यक्त पाती हैं।”
  • सीताराम चतुर्वेदी के अनुसार– “भाषा के आविर्भाव से सारा मानव संसार गूंगों की विराट बस्ती बनने से बच गया।”
  • रामचन्द्र वर्मा के अनुसार– मुख से उच्चारित होने वाले शब्दों और वाक्यों आदि का समूह, जिसके द्वारा मन की बातें बतायी जाती है भाषा कहलाती है।
  • कामता प्रसाद गुरू के अनुसार– “भाषा वह साधन है, जिसके द्वारा मनुष्य अपने विचार दूसरों पर भली-भाँति प्रकट कर सकता है और दूसरों के विचार स्पष्टतः समझ सकता हैं।”

भाषा के आधार-
भाषा के दो आधार होते है-

  1. मानसिक आधार
  2. भौतिक आधार
  • अपने विचार या भाव को अभिव्यक्त करने के लिए वक्ता द्वारा भाषा का प्रयोग किया जाता है, वह मानसिक आधार है तथा श्रोता द्वारा ग्रहण करना भौतिक आधार है। भौतिक आधार अभिव्यक्ति का न है जबकि मानसिक आधार साध्य । दोनों से भाषा का निर्माण होता है। इसे ही बाह्य भाषा और आन्तरिक भाषा कहते है।

भाषा की उत्पत्ति-

भाषा की उत्पत्ति के निम्नलिखित सिद्धांत प्रचलित है

  1. दैवी उत्पत्ति का सिद्धांत
  2. सांकेतिक उत्पत्तिवाद
  3. डिंगडागवाद
  4. अनुकरण मूलकतावाद
  5. प्रतीकवाद
  6. संपर्क सिद्धांत
  7. समन्वय सिद्धांत
  8. यो- हे हो वाद
  9. टा-टा वाद
  10. मनोभाव अभिव्यंजकतावाद ।

भाषा के अंग-

  • भाषा के निम्नलिखित तीन अंग है –
    1. ध्वनि     2. अर्थ    3. वाक्या

भाषा के रूप या प्रकार-

  • भाषा के दो रूप है :-
    1. मौखिक भाषा 2. लिखित भाषा
  • मौखिक भाषा की आधारभूत इकाई ध्वनि है।
  • लिखित भाषा की आधारभूत इकाई वर्ण है।
अनुसूची-8

मूल संविधान की अनुसूची 8 में 14 भाषाओं का उल्लेख था लेकिन समय-समय पर संशोधन प्रक्रिया द्वारा कुछ और भाषाओं को जोड़ा गया जिससे इनकी संख्या 22 हो गयी है।

संशोधन निम्नलिखित है-

1. 21वाँ संविधान संशोधन 1967 : सिंधी भाषा को जोड़ा गया।
2. →  71वाँ संविधान संशोधन 1992 : मणिपुरी, कोंकणी नेपाली
3. →  92वाँ संविधान संशोधन 2003 : बोडो डोंगरी मैथिली, संथाली आदि।
सबसे पहले असमिया तथा चौथे नम्बर पर हिन्दी को जोड़ा गया था।

Question 1. राजभाषा अधिनियम 1963 क्या है?

Answer → इस अधिनियम में कुल 9 धाराएँ थी, जिनमें यह प्रावधान किया गया कि हिन्दी राजभाषा के रूप में कार्य करती रहेगी तथा अंग्रेजी अनुच्छेद 343 (2) के अनुसार ही कार्यरत रहेगी। लेकिन अधिनियम 1963 के संशोधन 1965 व 1967 में यह प्रावधान किया गया कि अंग्रेजी सहायक राजभाषा या उपराजभाषा के रूप में कार्य करेगी।

Question 2. दूसरा राजभाषा अधिनियम 1976 क्या है?

Answer → इसमें प्रावधान किए गए कि हिन्दी राजभाषा के रूप में अनिश्चित वर्षों तक जब तक संसद कोई कानून नहीं बनाती कार्य करती रहेगी तथा अंग्रेजी का प्रयोग यथारूप रहेगा। तथा इस अधिनियम मे कुल 12 अध्याय थे और राजभाषा हिन्दी के आधार पर समस्त भारत को तीन भागों में विभाजित किया गया।

1. क वर्ग ⇒ इसके अंतर्गत उन राज्यों को रखा गया जिनकी राजभाषा हिन्दी है, अर्थात- समस्त हिन्द प्रदेश।
2. ख वर्ग ⇒ ऐसे राज्य जहाँ हिन्दी राजभाषा न हो लेकिन हिन्दी को बोला एवं समझा जाता हो, उन्हें इस वर्ग अंतर्गत रखा गया है। जैसे- पंजाब, गुजरात, महाराष्ट्र, चण्डीगढ़, दादर नगर हवेली तथा अण्डमान निकोबार द्वीप समूह।
3. ग वर्ग ⇒ इसमें ऐसे राज्यो को शामिल किया गया है जहाँ न तो हिन्दी बोली जाती है और नही समझी जाती हैं। अर्थात- समस्त अहिन्द क्षेत्र इसमें शामिल किया गया है। जैसे- केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु, उड़ीसा, आन्ध्रप्रदेश, तेलगांना आदि।

  1. आदि काल की भाषा को डिंगल पिंगल कहा जाता है।
  2. छंद को पिंगल भी कहा जाता है। छंद के जो जनक है वो पिंगल है।
  3. पं. रामकानाथ ने हिन्दी का पहला व्याकरण दिया।
  4. हरिश्चंद्र ने 1868 में कविसुधावचन तथा 1873 में हरिश्चंद्र मैग्जीन/पत्रिका तथा 1884 में नारी-सुधार के लिए बाल-बोधनी पत्रिका निकाली।
  5. महावीर प्रसाद द्विवेदी ने सरस्वती पत्रिका 1903 में निकाली।
  6. सोमदेव प्रभु सूरी ने सन् 1959 ई. में यश तिलक चम्पू नामक तिलक की रचना की।
  7. चैतन्य महाप्रभु के शिल्प रूपगोस्वामी 1490 से 1563 ने एक काव्यशास्त्र परखग्रंथ उज्ज्वल नीलमणी की रचना की।

लघुउत्तरीय प्रश्न

  1. भारत में भाषा के विकास को समझाइयें ?
  2. भारतीय आर्य भाषा किसे कहते है?
  3. भारतीय आर्य भाषाओं को कितने भागों में बाँटा गया है?
  4. बौद्ध धर्म की मुख्य भाषा क्या थी ?
  5. मध्यकालिन युग में दो मुख्य भाषाओं को लिखो?
  6. जैन उपदेशों की मुख्य भाषा क्या थी?
  7. आमजन की भाषा किसे कहा जाता है ?
  8. आचार्य दण्डी ने अपभ्रंश को क्या कहा है?
  9. स्वयम्भू की काव्य की मुख्य भाषा क्या थी?
  10. मध्यकालीन हिन्दी पर किन दो भाषाओं का प्रभाव था?
  11. रासों काव्य किसे कहा जाता है?
  12. खड़ी बोली किसे कहा जाता है?
  13. खड़ी बोली के जनक का नाम लिखिए?
  14. विभाषा किसे कहते है?
  15. किसी तीन विभाषाओं के नाम लिखों?
  16. राज भाषा से क्या तात्पर्य है?
  17. विश्व हिन्दी सम्मेलन का आयोजन किस अनुच्छेद के तहत किया जाता है?
  18.  14 सितम्बर क्यों महत्वपूर्ण है ?
  19. 10 जनवरी का क्या महत्व है?
  20. लिपि को समझाइयें?
  21. भारत में कितने भाषा परिवारों की भाषाओं को बोला जाता है?
  22. का वर्ग की नियमावाली को लिखिए?
  23. अनुसूची 8 को समझाइये?
  24. प्रदेशी भाषाओं से तत्पर्य है ?
  25. काव्य में प्रयुक्त होने वाली दो मुख्य भाषाएँ है?
  26. प्रथम राजभाषा अधिनियम 1963 क्या है ?
  27. दूसरी राजभाषा अधिनियम 1976 क्या है ?

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