Hindi Varnmala

Hindi Varnmala

भाषा की सबसे छोटी इकाई ध्वनि होती है। चूंकि ध्वनि को वर्णों के माध्यम से लिखा जाता है इसलिए वर्ण को भी भाषा की सबसे छोटी लिखित इकाई मान लिया जाता है।
इन वर्गों के व्यवस्थित समूह को वर्णमाला Hindi Varnmala कहते हैं। हिन्दी वर्णमाला Hindi Varnmala में 52 वर्ण होते हैं। लेकिन देवनागरी में 48 वर्ण होते है जिन्हें हम स्वर तथा व्यंजन में विभक्त करके पढ़ते हैं।

A. अक्षर akshar  :- मुख से निकली हुई ध्वनि अक्षर akshar कहलाती है। अर्थात् ऐसी ध्वनि जो नष्ट न हो अक्षर akshar कहलाती हैं।

वर्ण -अक्षर के लिखित रूप को वर्ण कहते हैं। भाषा की सबसे छोटी इकाई वर्ण कहलाती हैं।

B. वर्णमाला Hindi Varnmala:- वर्णो के व्यवस्थित समूह को वर्णमाला Hindi Varnmala कहते हैं।

स्वर — 11
व्यंजन – 33
संयुक्त व्यंजन 04 (क्ष, त्र, ज्ञ, श्र)
अयोगवाह 02 (अं, अः)
द्विगुण व्यंजन 02 (ड, ढ़)

1. स्वर { vowel }

परिभाषा– वे वर्ण जो मौलिक है जो स्वतंत्र हैं, जो बिना किसी सहायता के बोले व लिखे जाते हैं। जिनके उच्चारण में वायु बिना बाँधा के गति से बाहर निकलती हैं  अथवा वे ध्वनियां जिनके उच्चारण में वायु स्वर vowel तंत्रियों से उठकर बिना अवरुद्ध के बाहर निकल जाए, उन्हें स्वर { vowel } कहते हैं। हिन्दी के मूल स्वर 10 माने जाते हैं (अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ)

लेकिन ‘ऋ’ के आने से हिन्दी में स्वरों vowel की संख्या 11 हो गई।
लेकिन कुल स्वर  { vowel }13 होते हैं। (अं, अः को जोड़कर)

अं., अः को अयोगवाह ध्वनियाँ किशोरीलाल वाजपेयी ने कहा।
स्वरों का वर्गीकरण– स्वरों { vowel } को मुख्य रूप से दो प्रकारों में बाँटा गया है:

हृस्व स्वर

जिनके उच्चारण में कम समय लगे अथवा ये वर्ण जिनके उच्चारण में साधारण समय लगता हैं, इसके उच्चारण की गति एक हैं। जिसे छंद मे लघु मात्रा Hindi matra कहते हैं। इसका चिह्न लघु मात्रा Hindi matra हैं। जो खड़ी पाई ( 1 ) के रूप में बताई जाती है। इनको मूल स्वर vowel भी कहते है। जैसे- अ, इ, उ, ऋ

दीर्घ/संयुक्त/संधि स्वर

जिनके उच्चारण में अधिक समय  लगे अथवा वे वर्ण जिनके उच्चारण में लघु की अपेक्षा दुगना समय लगता हैं। इसके समय की मात्रा Hindi matra या गिनती 2 है। जिसका चिह्न वर्तुल रेखा द्ध कहलाती है। जैसे- आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ।

विलुप्त या प्लुत स्वर

जिनके उच्चारण में दीर्घ स्वर { vowel } से भी अधिक समय लगे, उन्हें विलुप्त या प्लुत स्वर vowel कहते हैं। इनका प्रयोग नाटक तथा संवादों में किया जाता है इसका प्रयोग प्रायः दूर से पुकारने, रोने, गाने और चिल्लाने में होता हैं।      जैसे ऊँ , ओ3म, हेऽराम

अयोगवाह ध्वनियाँ

वे वर्ण जो न तो स्वर { vowel } हैं, न ही व्यंजन अपितु स्वर भी हैं, और व्यंजन भी हैं, इनकी संख्या 2 हैं। किशोरीलाल वाजपेयी ने अं अः को अयोगवाह कहा जिन ध्वनियों का उच्चारण व्यंजनों की तरह तथा प्रयोग स्वरों vowel की तरह हो उन्हें आयोगवाह कहा गया।
जैसे- अं अः

लिखने पर⇒⇒ ⇒⇒उच्चारण करने पर

अं = अ + ङ      ⇒ अः = अ + स्

अं= अ + म्      अः = अ + ह

अं = इसमें ‘अ’ स्वर हैं और शिरोरेखा के ऊपर लगी बिंदु को अनुस्वार कहते हैं। अनुस्वार अनुनासिक के बदले आते हैं, यह हमेशा स्वर के बाद ही आता हैं, इसका उच्चारण नाक से होता हैं।

  • दंत  ⇒  दन्त
  • द् + अ + न् + त् + अ
  • अः ⇒ इसमें ‘अ’ स्वर है और ‘अ’ के पास एक के ऊपर एक लगी बिंदु को विसर्ग कहते हैं। विसर्ग का उच्चारण ‘हे’ होता है। किंतु लिपि में ‘स’ लिखा जाता हैं। विसर्ग कहते है। not ok
  • प्रातः  ⇒ प्रातस्
  • अंतः ⇒ अतस्

मात्रा { Hindi Matra }

स्वर के परिवर्तित रूप को मात्रा Hindi matra कहते हैं, अर्थात् स्वर जब किसी वर्ण में जुड़ता हैं तब अपना रूप परिवर्तित कर लेता हैं, इस परिवर्तित रूप को मात्रा Hindi matra कहते हैं। कुल मात्रा 10 हैं, जो इस प्रकार हैं।

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मूल स्वर

मूल स्वर ‘अ’ हैं यह ईश्वर का दिया स्वर है जीभ के मध्य से इसका उच्चारण होता हैं। अतः हर परिस्थिति में ‘अ’ का उच्चारण स्वतः शामिल हो जाता हैं।

आगत स्वर

वे वर्ण जो विदेशी भाषाओं के हैं और आवश्यकता एवं सुविधा के अनुसार हिंदी में अपना लिए गए हैं, आगत स्वर कहलाते हैं। अंग्रेजी से (ऑ)-इसका उच्चारण आ और ओ के मध्य उच्चारण होता हैं। जैसे – कॉलेज, डॉक्टर, हॉल, हॉस्पिटल

• नुक्ता – (.): उर्दू से नुक्ता (.) लिया हैं, यह पांच वर्ण में लगता हैं (क, ख, ग, ज, फ) जैसे – जरा – थोड़ा, जरा – बुढ़ापा

2. व्यंजन { vyanjan }

व्यंजन :  vyanjan

वे वर्ण जो स्वर की सहायता से बोले व लिखे जाते हैं, व्यंजन vyanjan कहलाते हैं। व्यंजन मुख्यतः 4 प्रकार के होते हैं।

• संयक्त व्यंजन
• ऊष्म व्यंजन
• स्पर्श व्यंजन
• अंतस्थ व्यंजन

अथवा

परिभाषा-जिन ध्वनियों के उच्चारण में वायु में अवरूद्ध पैदा हो व्यंजन vyanjan कहलाती है।
अथवा
जिन ध्वनियों का उच्चारण स्वतंत्र रूप से न हो लेकिन प्रयोग स्वतंत्र रूप से होता है उन्हें व्यंजन vyanjan कहते है।

व्यंजनों के प्रमुख भेद होते हैं-

स्पर्शी व्यंजन

वे वर्ण जिन्हें बोलते समय एक अंग दूसरे को स्पर्श करे or जिन ध्वनियों के उच्चारण में वायु स्वर तंत्रि से उठकर मुँह के विभिन्न भाग, कंठ, तालु, मूर्धा, दन्त, ओष्ठ से स्पर्श करते हुए बाहर निकल जाए उन्हें स्पर्शी व्यंजन vyanjan कहते है।इनकी संख्या 25 होती हैं तथा इनको 5 वर्गों में तथा प्रत्येक वर्ग में 5-5 वर्णों में विभाजित किया गया है।

अंतःस्थ व्यंजन

जिन ध्वनियों का उच्चारण स्वर तथा व्यंजनों vyanjan के बीच से हो or वे वर्ण जिनके उच्चारण में वायु मुख के अंदर घूम कर बाहर निकलती हैं। उसे अंतस्थ व्यंजन कहते हैं। ये व्यंजन 4 हैं। (य, र, ल, व)

उष्म संघर्षी व्यंजन

जिन ध्वनियों की उच्चारण में एक सी सरसराहट या ऊष्मा पैदा हो or वे वर्ण जिनके उच्चारण में वायु मुख के अंदर घर्षण करती हुई बाहर निकलती हैं। उसे ऊष्म व्यंजन कहते हैं। ये 4 होते हैं (श, ष, स, ह)। ध्वनि में घर्षण होता है।

उक्षिप्त व्यंजन

जिन ध्वनियों के उच्चारण में उच्चारण में वायु झटके से बाहर निकले उन्हें उक्षिप्त व्यंजन कहते है। जैसे- ट्, ठ, ड् ढ़

द्विगुणक व्यंजक

प्रयोग की दृष्टि से जो व्यंजक दो गुण प्रदर्शित करे or वे वर्ण जो देवनागरी लिपि में उपयोग किये जाते हैं। किंतु व्यंजन में नहीं गिने जाते हैं। उन्हें द्विगुण व्यंजन कहते हैं। इनकी संख्या 2 हैं। ड, ढ़ (ये हमेशा दूसरे या अंत में आते हैं)।

संयुक्त व्यंजन

वे वर्ण जो दो असमान व्यंजन के मेल से बनते हैं, संयुक्त व्यंजन कहलाते हैं। or जिन ध्वनियों का निर्माण एक से अधिक ध्वनियों के मेल से हुआ है उन्हे संयुक्त ध्वनियाँ कहते हैं तथा जिन व्यंजनों का निर्माण एक से अधिक व्यंजनों के मेल से हुआ हो उन्हें संयुक्त व्यंजन कहते है। जैसे-

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इनका वर्ण माला में स्थान इनके पहले-पहले वर्ण के बाद आता है।

व्यंजनों को चार भागों में वर्गीकृत किया गया है-
1. स्थान के आधार पर

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2. प्रयत्न के आधार पर

स्पर्श अंतस्थ संघर्षी उत्क्षिप्त
स्पर्शी 16 स्पर्श संधर्षी 4 नासिक 5 पाश्विक प्रकंपित अर्द्धस्वर उष्म द्विगुण
क , ख , ग , घ ,ट , ठ , ड , ढ , त , थ , द , ध प , फ , ब , भ च, छ,ज, झ ङ ञ ण न म य, व श, ष स ह ड़,ढ़,

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द्वित्व व्यंजन

वे वर्ण जो समान व्यंजन के मेल से बनते हैं उन्हें द्वित्व व्यंजन कहते हैं। जैसे कच्चा, पक्का, दिल्ली, उड्डयन, बिल्ली, कुत्ता।

अंतःमुखी व्यंजन

जिन ध्वनियों का उच्चारण मुख के आंतरिक भाग कंठ से हो उन्हें अंतःमुखी व्यंजन कहते हैं। जैसे-ह

पार्श्विक व्यंजन

जिन ध्वनि के उच्चारण में वायु जीभ के पार्श्विक किनारों से स्पर्श करके बाहर निकले उसे पार्श्विक व्यंजन कहते है    जैसे ल

लुंठित या प्रकम्पित व्यंजन

जहाँ वायु लुढ़ककर बाहर निकले उसे लुंठित व्यंजन कहते हैं। जैसे- र्
सम्पूर्ण व्यंजन वर्णों को दो भागों में बाँटा गया है
1. अल्पप्राण
2. महाप्राण

अल्पप्राण

जिन व्यंजन वर्गों के उच्चारण में ‘हकार’ (ह) की ध्वनि नहीं होती है, उन्हें अल्पप्राण व्यंजन कहते हैं।
ये वर्ण है प्रत्येक वर्ग का पहला तीसरा और पांचवा वर्ण तथा अन्तःस्थ व्यंजन। (क, ग, ड, च, ज, ञ, ट, ड, ण, त, द, न, प, ब, म, य, र, ल, व)

महाप्राण

जिन व्यंजन वर्णों के उच्चारण में ‘हकार’ (ह) की जैसी ध्वनि रहती है, उन्हें महाप्राण व्यंजन कहते है।
प्रत्येक वर्ग का दूसरा, चौथा वर्ण तथा उष्म व्यंजन वर्ण । (ख, घ, छ, झ, छ, ठ, ढ, थ, ध, फ, भ, श, ष, स, ह)

वर्णमाला के भेद-घोष और अघोष

• वर्णमाला Hindi Varnmala के समूह को दो भागों में बाँटा गया है ।
(1) घोष    (2) अघोष

1. घोष– जिन वर्णों के उच्चारण में आपस में स्वर तंत्रियाँ झंकृति होती हैं, उन वर्गों को घोष वर्ण कहा जाता है। ऐसे वर्ण है
(1) सभी स्वर- अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ए, ऐ, ओ, औ।
(2) प्रत्येक वर्ग का तीसरा, चौथा, पाँचवा वर्ण- ग, घ, ड, ज, झ, ञ, ड, ढ, ण, द, ध, न, ब, भ, म।
(3) अन्तःस्थ व्यंजन- य, र, ल, व ।
(4) उष्म व्यंजन- ह।

अघोष– जिन वर्णों के उच्चारण में आपस में स्वरतंत्रियाँ झंकृति नहीं होती हैं, वे अघोष वर्ण कहलाती हैं। ऐसे वर्ण है।
(1) प्रत्येक वर्ग का पहला और दूसरा वर्ण
क, ख, च, छ, ट, ठ, त, थ, प, फ।
(2) उष्म व्यंजन- श, ष, स।

अभ्यास हेतु लघु उत्तरी प्रश्न
1. वर्ण किसे कहाँ जाता है?
2. ध्वनी कहलाती है?
3. स्वर किसे कहते है?
4. व्यंजन किसे कहते है?
5. घोष के आधार पर ध्वनियों का वर्गीकरण कीजिए।
6. प्राणत्व के आधार पर व्यंजनों का वर्गीकरण कीजिए?
7. वर्गीय व्यंजन किसे कहते है तथा इनकी संख्या ?

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